कठोरता सदैव दुःखदायी होता है,घोर स्वाभिमान असह्य होता है।इन्ही सब लक्षणों से मंगल पाप ग्रह माना जाता है।
मनुष्य के नेत्र में ही अमृत और नेत्र में ही विष होता है,मंगल का क्रोध पर अधिपत्य है,जब क्रोध की चरमावस्था आती है तो सुख का ही ह्रास होता है, सुख से जातक वंचित हो जाता है।
यह ग्रह पुरुष जाति रक्तवर्ण दक्षिण दिशा का स्वामी अग्नि तत्व वाला पित्त प्रकृति वाला है।
यह धैर्य तथा पराक्रम का स्वामी भाई-बहन का कारक रक्त एवं शक्ति का नियामक कारक है।
ज्योतिष शास्त्र इसे पाप ग्रह मानता है।
यह उत्तेजित करने वाला तृष्णा कारक तथा सदैव दुःखदायी रहता है मंगल 3 तथा 6 स्थान में बली होता है 10वें स्थान में दिगबली होता है। चन्द्रमा के साथ रहने पर चेष्टाबली होता है। द्वितीय स्थान में निष्फल बलहीन होता है।
कुंडली में मंगली दोष की परिभाषा और शांति उपाय
जब मंगल कुंडली के 1, 4, 7, 8 या 12 वें स्थान पर हो तो यह मंगल दोष है और ऐसे ब्यक्ति को मांगलिक कहा जाता है। हमारे समाज में मंगल दोष की उपस्थिति एक बहुत बड़ा डर या भ्रम बन गया है। मंगल दोष को अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह वैवाहिक जीवन में समस्याएं पैदा कर सकता है। इसलिए विवाह से पहले मंगल दोष के लिए कुंडली मिलाना अनिवार्य है। यह भी जरुरी है कि कुंडली का विश्लेषण करें और यह पता लगाएं कि कुंडली में मंगल दोष है या नहीं।
मंगली दोष से पीड़ित कुंडली विचार
यदि मंगल पहले स्थान पर हो तो 4, 7 और 8 घर पर दृष्टि करता है। तो वो घर व्यक्ति के चरित्र व को दर्शाता है। इस कारण से व्यक्ति बहुत आवेगी और तुरंत गुस्सा करनेवाला हो सकता है। मंगल की द्रष्टि से चतुर्थ स्थान ,घर, गाड़ी, अग्नि, रसायन या बिजली से दुर्घटना को दर्शाता है। मंगल कि द्रष्टि से सप्तम स्थान में वैवाहिक जीवन में बाधायें आती हैं। अष्टम स्थान में होने से भयंकर दुर्घटना हो सकती है। इस प्रकार लग्न में मंगल का बैठना अशुभ माना जाता है। यदि मंगल चतुर्थ स्थान में बैठा है तो यह 4 के साथ 7, 10 और 11 घर को भी प्रभावित करेगा। हमने 4 और 7 घरों के प्रभावित प्रभावों को जाना है। मगल से प्रभावित दशम घर व्यवसाय में तेजी से बदलाव, अनिद्रा और पिता से तनाव का कारण हो सकता है। ग्यारहवें घर के प्रभावित होने से चोरी या दुर्घटना में हानि हो सकती है। इसलिए चतुर्थ घर में मंगल बहुत अच्छा नहीं है। यदि मंगल सात बे घर में हो तो यह 10, 1 और 2 घर को प्रभावित करता है। सातवाँ घर वैवाहिक जीवन और जीवनसाथी का स्थान होता है। इसलिए यहां मंगल का होना वैवाहिक जीवन में कठिनाइयों का सूचक है। दूसरे घर में मंगल पारिवारिक सदस्यों के बीच विवाद पैदा करता है। मतभेद के कारण परिवार में ख़ुशी की कमी और समस्याएं आ सकती हैं। पैसे खो सकते हैं या खर्च की अधिकता हो सकती है। इसलिए 7 वें भाव में मंगल कठिनाइयों को बढ़ा सकता है। यदि मंगल अष्ट्म घर में बैठा है तो यह 11, 2 और 3 घर को प्रभावित करेगा। व्यक्ति आग, रसायन या बिजली से जानलेवा दुर्घटना का शिकार हो सकता है। यदि तीसरा घर मंगल से दृष्ट है तो भाई बहन में तनाव होता है। यह व्यक्ति को बहुत कठोर और हठी बना देता है। इसलिए अष्टम घर में मंगल का होना अच्छा नहीं है। अगर मंगल 12 वें घर में हो तो यह 3, 6 और 7 घर को प्रभावित करता है। 12 वां घर व्यक्ति की आदतों को दर्शाता है। इससे व्यक्ति खर्च की अधिकता के बोझ तले दब जाता है। व्यक्ति को हाई ब्लड प्रेसर और टेंसन के साथ ही पेट से जुड़ी और खून से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं। इसलिए 12 बे घर में मंगल का होना भी अशुभ है।इस प्रकार मंगल दोष कई तरह की समस्यायों का कारण है जो सभी नहीं दी गयी है यहाँ जिन के परिणाम और भी खराब है । लेकिन परेशान होने की आवश्यकता नहीं हैं। प्रतियेक समस्या का समाधान जरुर होता हैं लेकिन कुडली की समग्र शक्ति, ग्रहों की शक्ति, उपयोगी पहलू और मंगल की शक्ति पर अवश्य विचार किया जाना चाहिए।
मंगली दोष परिहार
जन्म कुन्डली के प्रथम द्वितीय चतुर्थ सप्तम अष्टम एकादश और द्वादस भावों में किसी में भी मंगल विराजमान हो तो वह विवाह को विघटन में बदल देता है,यदि इन भावों में विराजमान मंगल यदि स्वक्षेत्री हो,उच्च राशि में स्थिति हो,अथवा मित्र क्षेत्री हो,तो दोषकारक नही होता है।
यदि जन्म कुन्डली के प्रथम भाव में मंगल मेष राशि का हो,द्वादस भाव में धनु राशि का हो,चौथे भाव में वृश्चिक का हो,सप्तम भाव में मीन राशि का हो,और आठवें भाव में कुम्भ राशि का हो,तो मंगली दोष नही होता है।
यदि जन्म कुन्डली के सप्तम, लगन, चौथे, नौवें,और बारहवें भाव में शनि विराजमान हो तो मंगली दोष नही होता है.यदि जन्म कुन्डली में मंगल गुरु अथवा चन्द्रमा के साथ हो,अथवा चन्द्रमा केन्द्र में विराजमान हो,तो मंगली दोष नही होता है।
यदि मंगल चौथे,सातवें भाव में मेष, कर्क, वृश्चिक,अथवा मकर राशि का हो,तो स्वराशि एवं उच्च राशि के योग से वह दोष रहित हो जाता है,अर्थात मंगल अगर इन राशियों में हो तो मंगली दोष का प्रभाव नही होता है,कर्क का मंगल नीच का माना जाता है,लेकिन अपनी राशि का होने के कारण चौथे में माता को पराक्रमी बनाता है,दसवें में पिता को पराक्रमी बनाता है,लगन में खुद को जुबान का पक्का बनाता है,और सप्तम में पत्नी या पति को कार्य में जल्दबाज बनाता है,लेकिन किसी प्रकार का अहित नही करता है.केन्द्र और त्रिकोण भावों में यदि शुभ ग्रह हो,तथा तृतीय षष्ठ एवं एकादश भावों में पापग्रह तथा सप्तम भाव का स्वामी सप्तम में विराजमान हो,तो भी मंगली दोष का प्रभाव नही होता है।
वर अथवा कन्या की कुन्डली में मंगल शनि या अन्य कोई पाप ग्रह एक जैसी स्थिति में विराजमान हो तो भी मंगली दोष नही लगता है.यदि वर कन्या दोनो की जन्म कुन्डली के समान भावों में मंगल अथवा वैसे ही कोई अन्य पापग्रह बैठे हों तो मंगली दोष नही लगता,ऐसा विवाह शुभप्रद दीर्घायु देने वाला और पुत्र पौत्र आदि को प्रदान करने वाला माना जाता है।
यदि अनुष्ठ भाव में मंगल वक्री,नीच (कर्क राशि में) अथवा शत्रु क्षेत्री (मिथुन अथवा कन्या ) अथवा अस्त हो तो वह खराब होने की वजाय अच्छा होता है.जन्म कुन्डली में मंगल यदि द्वितीय भाव में मिथुन अथवा कन्या राशि का हो,द्वादस भाव में वृष अथवा कर्क का हो,चौथे भाव में मेष अथवा वृश्चिक राशि का हो,सप्तम भाव में मकर अथवा कर्क राशि का हो,और आठवें भाव में धनु और मीन का हो,अथवा किसी भी त्रिक भाव में कुम्भ या सिंह का हो,तो भी मंगल दोष नही होता है।
जिसकी जन्म कुन्डली में पंचम चतुर्थ सप्तम अष्टम अथवा द्वादस स्थान में मंगल विराजमान हो,तो उसके साथ विवाह नही करना चाहिये,यदि वह मंगल बुध और गुरु से युक्त हो, अथवा इन ग्रहों से देखा जा रहा हो,तो वह मंगल फ़लदायी होता है,और विवाह जरूर करना चाहिये.शुभ ग्रहों से युक्त मंगल अशुभ नही माना जाता है,कर्क लगन में मंगल कभी दोष कारक नही होता है।
यदि मंगल अपनी नीच राशि कर्क का अथवा शत्रु राशि तीसरे या छठवें भाव में विराजमान हो तो भी दोष कारक नही होता है.यदि वर कन्या दोनो की जन्म कुन्डली में लग्न चन्द्रमा अथवा शुक्र से प्रथम द्वितीय चतुर्थ सप्तम अष्टम अथवा द्वादस स्थानों के अन्दर किसी भी स्थान पर मंगल एक जैसी स्थिति में बैठा हो,अर्थात वर की कुन्डली में जहां पर विराजमान हो उसी स्थान पर वधू की कुन्डली में विराजमान हो तो मंगली दोष नही रहता है। परन्तु यदि वर कन्या में से केवल किसी एक की जन्म कुन्डली में ही उक्त प्रकार का मंगल विराजमान हो,दूसरे की कुन्डली में नही हो तो इसका सर्वथा विपरीत प्रभाव ही समझना चाहिये,अथवा वह स्थिति दोषपूर्ण ही होती है,यदि मंगल अशुभ भावों में हो तो भी विवाह नही करना चाहिये,परन्तु यदि गुण अधिक मिलते हो,तथा वर कन्या दोनो ही मंगली हो,तो विवाह करना शुभ होता है।
मंगल दोष के शांति उपाय
जिनकी राशि में मंगल अशुभ फल देने वाला है उन्हें निम्न उपाय करने से मंगल अनुकूल हो जाएगा व्यवसाय और जीवन में आ रही बाधा कम होगी।
👉 मंगल शांति के लिए मंगल का दान (लाल रंग का बैल, सोना, तांबा, मसूर की दाल, बताशा, लाल वस्त्र आदि) किसी गरीब जरूरतमंद व्यक्ति को दें।
मंगल का मंत्र: ऊँ अंगारकाय विद्महे शक्तिहस्ताये धीमहि तन्नौ भौम: प्रचोदयात्। इस मंत्र का नित्य जप करें।
👉 मंगलवार का व्रत रखें ।
👉 मंगलवार को किसी गरीब को पेटभर खाना खिलाकर तृप्त करें।
👉 अपने घर में भाई-बहनों का विशेष ध्यान रखें। मंगलवार को उन्हें कुछ विशेष उपहार दें।
👉 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंगल हमारे शरीर के रक्त में स्थित माना गया है। अत: ऐसा खाना खाएं जिससे आपका रक्त शुद्ध बना रहे।
👉 मंगल प्रभावित व्यक्ति क्रोधी स्वभाव का, चिढ़-चिढ़ा हो जाता है, अत: प्रयत्न करें की क्रोध आप पर हावी न हो।
👉 लाल बैल दान करें।
👉 मंगल परम मातृभक्त हैं। वह सभी माता-पिता का सेवा-सम्मान करने वाले लोगों पर विशेष स्नेह रखते हैं अत: मंगलवार को अपनी माता को लाल रंग का विशेष उपहार दें।
👉 मंगल से संबंधित वस्तुएं उपहार में भी ना लें।
👉 लाल रंग मंगल का विशेष प्रिय रंग हैं अत: कम से कम को मंगलवार खाने में ऐसा खाना खाएं जिसका रंग लाल हो, जैसे इमरती, मसूर की दाल, सेवफल आदि।
अगर कुण्डली में मंगल दोष का निवारण ग्रहों के मेल से नहीं होता है तो व्रत और अनुष्ठान द्वारा इसका उपचार करना चाहिए. मंगला गौरी और वट सावित्री का व्रत सौभाग्य प्रदान करने वाला है. अगर जाने अनजाने मंगली कन्या का विवाह इस दोष से रहित वर से होता है तो दोष निवारण हेतु इस व्रत का अनुष्ठान करना लाभदायी होता है।
👉 जिस कन्या की कुण्डली में मंगल दोष होता है वह अगर विवाह से पूर्व गुप्त रूप से घट से अथवा पीपल के वृक्ष से विवाह करले फिर मंगल दोष से रहित वर से शादी करे तो दोष नहीं लगता है।
👉 प्राण प्रतिष्ठित विष्णु प्रतिमा से विवाह के पश्चात अगर कन्या विवाह करती है तब भी इस दोष का परिहार हो जाता है।
👉 मंगलवार के दिन व्रत रखकर सिन्दूर से हनुमान जी की पूजा करने एवं हनुमान चालीसा का पाठ करने से मंगली दोष शांत होता है।
👉 कार्तिकेय जी की पूजा से भी इस दोष में लाभ मिलता है।
👉 लाल वस्त्र में मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य लपेट कर नदी में प्रवाहित करने से मंगल अमंगल दूर होता है।

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